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भक्ति संग्रह


।। रथ सप्तमी ।। (पुत्र सप्तमी)

माघ शुक्ला सप्तमी को पाप का निवारण तथ पुत्र प्राप्ति के लिये रथ सप्तमी का व्रत करना चाहिए। तालाब, नदी या तीर्थ में जाकर ईख के डण्डे से जल को हिलाकर मस्तक पर पांच पत्ते आक के तथा पांच पत्र बेर के सिर पर रखकर सप्तमी को स्नान करें।

यह मन्त्र बोले -

यज्जन्म कृतं पापं मया सप्तसु जन्मसु।

तन्मे रोगं शोकं भास्करी हन्तु सप्तमी।।

 

सात जन्म तक मेरे द्वारा जो भी पाप हों तथा पापों के द्वारा जो रोग या शोक होने वाला हो। हे सूर्य सप्तमी ये सब पाप नष्ट करें। इसके पश्चात् सूर्य को अर्ध्य दें। तथा सप्तमी को निराहार रहकर अष्टमी को पारण करें तो सब रोग दोष दूर हो जाते हैं।

कथा - श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं, कि कम्बोज देश में यशोवर्मा नाम के राजा थे। वृद्धावस्था में उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई। किन्तु बालक बहुत रोगी रहता था। यशोवर्मा ने ऋषियों के पास जाकर इसका कारण पूछा। तब ऋषियों ने कहा यह पूर्व जन्म में महाकंजूस वैश्य था। जीवन में कोई दान या धर्म का आचरण नहीं किया। परन्तु रथ सप्तमी के व्रत करते हुए लोगों का दर्शन किया था। उसी पुण्य के प्रभाव से आपके यहां आकर जन्म ग्रहण किया। यह रथ सप्तमी का स्नान तथा व्रत करे तो शीघ्र ही स्वस्थ होकर राज्य सिंहासन पर बैठने का अधिकारी होगा। राजा ने विधिपूर्वक स्नान करके व्रत किया व्रत के प्रभाव से बालक निरोगी तथा भाग्यशाली हो गया। इस व्रत को करने से पुत्र प्राप्ति एवं रोगों से छुटकारा मिलता है। जो इस व्रत को करते हैं, उन्हें निश्चित रूप से पुत्र प्राप्ति एवं निरोगी काया प्राप्त होती है।

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