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Baba Khatu Shyam Ji Chalisa in Hindi Shyam Baba Chalisa

।। दोहा ।।

गुरू पद पंकज ध्यान धर, सुमिर सच्चिदानन्द।

श्याम चौरासी भणत हूं, रच चौपाई छन्द ।।


।। चौपाई ।।

महर करो जन के सुखरामी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

प्रथम शीश चरणन में नाऊँ। कृपा दृष्टि रावरी चाहूँ।।

माफ सभी अपराध कराऊँ। आदि कथा सुछन्द रच गाऊँ।।

भक्त सुजन सुनकर हरषासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

कुरू पांडव में विरोध जब छाया। समर महाभारत रचवाया।।

बली एक बर्बरीक आया। तीन सुबाण साथ में लाया।।

यह लखि हरि को आई हांसी। सावंलशाह खाटू के वासी।।

मधुर वचन तब कृष्ण सुनाए। समर भूमि केहि कारण आए।।

तीन बाण धनु कंध सुहाए। अजब अनोखा रूप बनाए।।

बाण अपार वीर सब ल्यासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बर्बरीक इतने दल माही। तीन बाण की ही गिनती नाही।।

योद्धा एक से एक निराले। वीर बहादुर अति मतवाले।।

समर सभी मिल कठिन मचासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बर्बरीक मम कहना मानो। समर भूमि तुम खेल न जानो।।

भीष्म द्रोण कृप आदि जुझारा। जिनसे पारथ का मन हारा।।

तू क्या पेश इन्हीं से पासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बर्बरीक हरि से यों कहता। समर देखना मैं हूं चाहता।।

कौन बली रणशूर निहारूँ। वीर बहादुर कौन जुझारू।।

तीन लोक त्रिबाण से मारूं। हंसता रहूं कभी न हारूं।।

सत्य कहूं हरि झूठ न जानो। दोनों दल इक तरफ हों मानो।।

एक बाण दल दोऊ खपासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बर्बरीक से हरि फरमावे। तेरी बात समझ नहीं आवे।।

प्राण बचाओ तुम घर जाओ। क्यों नादानपना दिखलाओ।।

तेरी जान मुफ्त में जासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

गरी विश्वास न तुम्हें मुरारी। तो कर लीजे जांच हमारी।।

यह सुन कृष्ण बहुत हर्षाए। बर्बरीक से वचन सुनाए।।

मैं अब लेहुं परीक्षा खासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

पात विटप केक सभी निहारो। बेध एक शर से सब डारो।।

कह इतना इक पात मुरारी। दबा लिया पद तले करारी।।

अजब रची माया अविनासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बर्बरीक धनु-बाण चढ़ाया। जानि जाए न हरि की माया।।

विटप निहार बली मुस्काया। अजित अमर अहिलावती जाया।।

बली सुमिर शिव बाण चलासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बाण बली ने अजब चलाया। पत्ते बेध विटप के आया।।

गिरा कृष्ण के चरणों माही। बिंधा पात हरि चरण हटाई।।

इससे कौन फतेह किमि पासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

कृष्ण बली कहै बताओ। किस दल की तुम जीत कराओ।।

बली हार का दल बतलाया। यह सुन कृष्ण सनाका खाया।।

विजय किस विध पारथ पासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

छल करना तब कृष्ण विचारा। बली से बोले नन्द कुमारा।।

ना जाने क्या ज्ञान तुम्हारा । कहना मानो बली हमारा।।

हो इक तरफ नाम पा जासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

कहै बर्बरीक कृष्ण हमारा। टूट न सकता प्रण करारा।।

मांगे दान उसे मैं देता। हारा देख सहारा देता ।।

सत्य कहूँ ना झूठ जरा सी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बेशक वीर बहादुर तुम हो। जंचते दानी हमें न तुम हो।।

कहै बर्बरीक हरि बतलाओ। तुमको चाहिए क्या बतलाओ।।

जो मांगे सो हमसे पासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

बली अगर तुम सच्चे दानी। तो मैं तुमसे कहूं बखानी।।

समर भूमि बलि देने खातिर। शीश चाहिए एक बहादुर।।

शीश दान दे नाम कमासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

हम तुम अर्जुन तीनों भाई। शीश दान दे को बलदाई।।

जिसको आप योग्य बतलावें। वही शीश बलिदान चढ़ावें।।

आवागमन मिटे चौरासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

अर्जुन नाम समर में पावे। तुम बिन सारथी कौन कहावे।।

मैं शीश दान दीन्हौं भगवाना। भारत देखन मन ललचाना।।

शीश शिखर गिरि पर धरवासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

शीश दान बर्बरीक दिया है। हरि ने गिरिपर धरा दिया है।।

समर अठारह रोज हुआ। कुरू दल सारा नाश हुआ है।।

विजय पताका पाण्डु फहरासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

भीम नकुल सहदेव पारथ। करते निज तारीफ अकारथ।।

यों सोच मन में यदुराया। इनके दिल अभिमान है छाया।।

हरि भक्तों का दुख मिटासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।

पारथ भीम आदि बलधारी। से यों बोले गिरवरधारी।।

किसने विजय समर में पाई। पूछो वीर बर्बरीक से भाई।।

सत्य बात सिर सभी बतासी। सांवलशाह खाटू के वासी।।



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