संतो के पास भक्तों के लिये दो मुख्य वस्तुऐं है…..?

संतो के पास भक्तों के लिये दो मुख्य वस्तुऐं है…..?

हमारे शास्त्रों में गृहस्थ जीवन को न सिर्फ आश्रम कहा है बल्कि चारों आश्रमों में इसे सर्वोत्तम माना है। और अधिकतर लोग गृहस्थ जीवन ही तो व्यतीत करते हैं। गृहस्थ आश्रम में रहकर यदि जीव पूर्ण निष्काम भाव से भगवद्-आराधन करें तो इससे अधिक उत्तम कुछ भी नहीं हैं। किन्तु साधु का वेष बनाकर गृहस्थ […]

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जीवन में तीन बातें सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं ……?

जीवन में तीन बातें सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं ……?

मनुष्य अपने हाथों से कर्म करके अपना भाग्य बनाता है। जो प्रातःकाल जागने पर अपने दोनों हाथों के दर्शन करके प्रभु से याचना करता है कि इन हाथों से सत्कर्म हों, उसके पास तीन वस्तुएं सदा रहती हैं, घर में लक्ष्मी रहती है, वाणी पर सरस्वती विराजती है, और हृदय में भगवान रहते हैं। चाहो […]

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जो मरने से डरेगा वो कभी युद्ध के लिये नहीं जायेगा …..?

जो मरने से डरेगा वो कभी युद्ध के लिये नहीं जायेगा …..?

सारी सृष्टि, मानव, दानव, दैत्य, देवता समस्त जीव यहां तक कि स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वरी भी, अपने अवतरित रूप में, कर्म से बंधे हुए है। कर्म से ही सुख मिलता है और कर्म से ही दुःख और एक शाश्वत सत्य ये है कि हमारे कर्मों का हिसाब एक जन्म के समाप्त हो जाने पर समाप्त नही […]

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दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं…?

दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं…?

दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं-पहले वे जो केवल कहते हैं, कुछ करते नहीं, दूसरे वो जो कहते हैं, वो करते भी हैं, और तीसरे वो लोग होते हैं, जो केवल करते हैं, उसका बखान नहीं करते। ***************************************************************************************************** जीवन समाप्त होने से पहले जीवन को शुद्ध कर लें। चित्त का शुद्ध होना ही […]

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राजा के तीन मुख्य कार्य होते हैं…?

राजा के तीन मुख्य कार्य होते हैं…?

जिस दिन सत्कर्म हो जीवन का वही दिन श्रेष्ठ है, सत्कर्म में लोभ विघ्न डालने आता है। लोभ को संतोष से मारो, लोभ को मार कर, प्रभु जिस स्थिति में रखें, उसी में संतोष मानो, और प्रफुल्लित रहो। ***************************************************************************************************** कभी-कभी अकेले बैठकर अपने आप से बात करने से, अपने कर्मों का विवेचन करने से, बड़ा […]

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मनुष्य की आत्मा उसका सबसे बड़ा गुरू है….?

मनुष्य की आत्मा उसका सबसे बड़ा गुरू है….?

मनुष्य की आत्मा उसका सबसे बड़ा गुरू है, इसलिये अपनी अंतरआत्मा के आदेश पर चलना ही धर्म है। जब कभी जीवन में धर्म संकट आ जाये, या अन्य विकट परिस्थितियों में ये समझना कठिन हो जाये कि क्या उचित और क्या अनुचित धर्म है, तो मनुष्य को अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुननी चाहिये, और उसी […]

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Mile hue sukh ka upbhog mat karo, balki uska upyog karo….?

Mile hue sukh ka upbhog mat karo, balki uska upyog karo….?

धन का सुरूचि पूर्वक तुम उपभोग करते हो, अथवा सुनीति पूर्वक उपयोग करते हो। ये प्रश्न सबको अपने आप से करना चाहिये। ***************************************************************************************************** किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति में आसक्त होकर मरखप जाना बुद्धिमानी नहीं है। मिले हुए सुख का उपभोग मत करो, उसका उपयोग करो, ताकि आसक्ति मिट जाये। ऐसे ही, दुःख के […]

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सुख की इच्छा संपूर्ण पापों का मूल है..?

सुख की इच्छा संपूर्ण पापों का मूल है..?

हम सबके भीतर के चैतन्य को भगवान के अंश को, ये जड़ संसार नहीं बांध सकता है, हमें बांधती है हमारी मनोवृत्ति। इसीलिये तो संतों ने कहा है कि मन ही हमारे बंधन का कारण है, और मन ही मुक्ति का कारण बनता है। **************************************************************************************************** दूसरे के सुख के लिये भोगा गया दुःख परिणाम में […]

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Ek bat hamesha yad rakhne ki hai……………………..?

Ek bat hamesha yad rakhne ki hai……………………..?

बस एक बात सर्वथा याद रखने की है, हम कहीं भी हैं, किधर भी हैं, कुछ भी कर रहे हैं, ईश्वर हमें देख रहे हैं, हमारी अच्छी, बुरी कोई भी दशा ईश्वर से छिपी नहीं है, चाहे आप उन्हें देखें न देखें, जाने न जाने, मानें न मानें। ***************************************************************************************************** इतनी बड़ी पृथ्वी और नक्षत्रों के […]

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Kam bolna aur adhik sunana hitkar hota hai…………..?

Kam bolna aur adhik sunana hitkar hota hai…………..?

कम बोलना और अधिक सुनना हितकर होता है, क्योंकि सुनना स्वयं के लिये और बोलना दूसरों के लिये होता है। ***************************************************************************************************** वर्तमान को संभालों, वर्तमान में सम्भलो, आगे-पीछे मत रहो, अर्थात् भूत की स्मृति, और भविष्य की चिंता त्यागकर, वर्तमान में रहो, क्योंकि भूत तुम्हारे हाथ से निकल गया और वापस आने वाला नहीं है, […]

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